OthersPapankusha Ekadashi 2020:Date,Timing And Significance

22nd October 2020by Arjun Chouhan0

भारत देश त्योहारों और व्रतों से परिपूर्ण है। हर एक व्रत और त्योहारों के अपने विधियाँ और महत्व होते हैं। वैसे तो हर त्योहारों अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण और फलदायी होते हैं, परन्तु एकादशी को सबसे ज्यादा महत्व वाला बताया जाता है। कहा जाता है के एकादशी सब त्योहारों और व्रतों से बढ़कर है ।
एकादशी ना केवल धार्मिक दृष्टी से महत्वपूर्ण है परंतु वास्तु और ज्योतिष दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
इसको धारण करने से चंद्रमा की स्तिथि से मानसिक और शारिरिक विकार दूर होते हैं ।
ग्रहों और नक्षत्रों के प्रभाव भी काफी हद तक कम किये जा सकते हैं ।
पापाकुंशा एकादशी अश्विन शुक्लपक्ष के एकादशी को मनाई जाती है। और जैसे के नाम से ही प्रतीत है, इस एकादशी को धारण करने से पापों से मुक्ति मिलती है। वेदों और ग्रंथो में कहा गया है के जो मानव इस व्रत को विधिपूर्वक धारण करता है ना केवल उसे परंतु उसके दस पीढ़ियों को भी इसका लाभ मिलता है। पापाकुंशा एकादशी मनुष्य को मनवांछित फल देकर स्वर्ग को प्राप्त कराने वाली है।

Date and mahurat
दिनांक और महूर्त

27th October 2020

Parana Time – 6:30 Am to 8.44 AM (Dwadas)
पारण समय – प्रातः ६:३० से ८:४४ तक (द्वादश को)

Dwadas End- 12.54 PM
द्वादश समाप्ति – १२:५४ अपराहन

Significance Of Papankusha Ekadashi

पापाकुंशा एकादशी के महत्व

इस व्रत के महत्व ख़ुद भगवान द्वारकाधीश कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को बताए थे ।
धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर के है भगवान! अश्विन शुक्ल एकादशी का क्या नाम है और इसका महत्व मुझसे कहिये, भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया के हे राजन ! पापों के नाश करने वाले इस एकादशी को पापाकुंशा एकादशी कहते हैं ।
इस दिन भगवान पद्मनाभ की पूजा करने से मनवांछित फल, धन धान्य, ऐश्वर्य और स्वर्ग की प्राप्त होती है।
भगवान पद्मनाभ के बस नाम मात्र से चारों धाम और और सभी तीर्थों के पुण्य प्राप्त होते हैं । सहस्त्र अश्वमेध यज्ञ भी इससे मिलने वाले पूण्य का मात्र 16वे भाग के बराबर है। पापाकुंशा एकादशी के बराबर कोई व्रत नहीं, ये लाखों गंगा और काशी स्नानों के बराबर फल देता है ।
ये व्रत शरीर में वास कर रहे समस्त रोगों को दूर करता है और इस व्रत को धारण कर मानुष यम के भय को त्याग कर भगवान जगन्नाथ के शरण में स्थान प्राप्त करता है।
हे युधिष्ठिर – नियमानुसार और विधिपूर्वक इस व्रत को धारण कर के मनुष्य भगवान जगन्नाथ और गरुड़ को प्रसन्न करता है और मनवांछित फल पाता है।
ये व्रत पिछले और आगे के दस पीढ़ियों का उद्धार करता है ।
इस व्रत को किये बिना सुख और स्वर्ग की प्राप्ती असम्भव है ।

पूजा विधि

Puja Vidhi

  • प्रातः काल उठे और भगवान पद्मनाभ का स्मरण करें।
  • स्नान ध्यान कर विधिवत भगवान पद्मनाभ की पूजन करें ।
  • हाथ में मौली धागा और मस्तस्क पर सफ़ेद चंदन लगा के पूजा करें ।
  • भगवान पद्मनाभ को पीले पुष्प और वस्त्र चढ़ाएं ।
  • भगवान विष्णु के मूल मंत्र
    “ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय नमः ।।” का जाप करें
    चाहे तो “हरे रामा हरे कृष्णा” का 108 बार जाप कर सकते हैं ।
  • लोग इस दिन जागरण या निरन्तर मूल मंत्र का जाप करना उचित मानते हैं।
  • गीता के अध्यायों का पाठ करें ।
  • इस दिन वैसे तो पूर्ण उपवास रखना सही माना जाता है परंतु अपने सामर्थ्य के अनुसार चाहे तो एक वेला उपवास रखकर, एक वेला पूर्ण सात्विक आहार ग्रहण कर सकते हैं।
  • चावल, नमक या उनसे बने सामग्री से दूर रहें।
  • फल, दूध या साबूदाने की खीर का उपभोग कर सकते हैं ।
  • इस दिन अन्न, सोना,तिल, भूमि या गौ दान करना शुभ माना जाता है।
    अपने सामर्थ्य अनुसार दान अवश्य करें।
  • रात्रि में श्री पद्मनाभ की पूजा उपासना करें ।
  • रात्रि में खाट का उपयोग ना करें, हो सके तो भूमि पर कुश की चटाई बिछा कर सोएं ।

 

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धन्यवाद्

 

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