OthersMoh paash

1st August 2020by Shubham Agarwal0

जब हम पैदा हुए,जग हंसे हम रोए,

ऐसी करनी कर चलो ,हम हंसे जग रोए।

इंसान के जन्म के साथ ही आशाएं,मोह जुड़ जाते हैं,हालांकि कबीर दास कहते हैं कि जब कोई बच्चा पैदा होता है तो ,पूरे परिवार में एक अलग ही मोह ममता वश खुशी छा जाती है ,और शीशी रोता है,लेकिन हम ऐसा कर्म करें, कि जब देह त्यागें तो मोह भी त्याग कर हंसते हुए ,पृथ्वी को त्यागें।

 

मोह का बंधन इंसान को कहीं ना कहीं कमज़ोर बना देता है,ये बंधन कई दफा टूटता है,इसलिए एक बात तो तय है कि मोह अल्पकालिक होता है,इसलिए इसके पीछे भागना उचित नहीं क्योंकि इसके पीछे भागने वाला इंसान अपने जन्म के मूल उद्देश्य को भूलकर इस भंवर जाल में उलझ कर रह जाता है,मोह के बंधन से ही निजात पाने के लिए ऋषि मुनि और बड़े बड़े महात्मा और संत तपस्या करते हैं ताकि उनका अगला जन्म ना हो और वे हमेशा हमेशा के लिए मोह पाश से स्वयं को दूर कर लें।

 

हालांकि मोह पाश से दूर होने का अनुभव करना हो तो सबसे अच्छी जगह है श्मशान घाट,आप यहां पर बड़े आराम से मोह के बंधन को टूटता हुआ महसूस करेंगे,दरअसल ये श्मशान घाट की ही विशेषता है कि वहां जाते ही इंसान बंधनों मुक्त महसूस करता है।

 

इसके लिए एक उदाहरण देकर मै समझाता हूं,हालांकि ये उदाहरण से बढ़कर एक वास्तविकता है,जब किसी का कोई सगा संबंधी ,देह त्याग देता है, तब सभी को उसके साथ बिताए गए पल का एहसास होता है और सभी रोते हैं,बिलखते हैं और उसे वापस पाने की चाह रखते हैं,लेकिन एक बार जब वो मृत शरीर श्मशान घाट पहुंचती है वैसे ही वहां पहुंचने वाले सभी व्यक्ति का चित्त शांत हो जाता है और कोई भी रोता बिलखता नहीं है और जगत की इस रीत को मानते हुए मोह पाश से स्वयं को दूर करता है,आप स्वयं भी कभी ना कभी इस महसूस करेंगे यदि अबतक ना किया हो।

 

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धन्यवाद्

 

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