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24th August 2020by Shubham Agarwal0

जीवन जीना भी एक कला है और ये स्वयं पर निर्भर होता है कि हम इस कला में कैसे माहिर होते हैं,कई तरीके हैं जीवन जीने के,लेकिन जो मूलभूत है उसी की यदि कमी हो जाए तो जीवन ही भारी पड़ जाता है और मृत्यु की खोज होने लग जाती है।

एक जो सबसे बड़ी कमी है जीवन जीने के दरम्यान वो है ईर्ष्या ,ईर्ष्या एकमात्र ऐसा शब्द है जो जीवन की परिभाषा ही बदल देती है,ईर्ष्या के कारण हम स्वयं को जान नहीं पाते,देख नहीं पाते और जीवन एक प्रश्न की तरह ही अंत समय में भी हमारे पास ज्यों का त्यों बना रहता है,यही नहीं इस ईर्ष्या की ही वजह से हम आपस में ही दुश्मन बन जाते हैं,अगर इस समय का डाटा खंगाला जाए तो लोगों ने खौफ़ इंसानों का ही है,एक व्यक्ति दूसरे का दुश्मन बना फिर रहा है और फिर हो रही तरह तरह की हिंसा और अमानवीय कृत।

अब ऐसे में किसे दोषी ठहराए और किसे नहीं ये भी सोचनीय है,आखिर ईर्ष्या कैसे प्रकट होती है,क्या कारण है कि ईर्ष्या एक दूसरे को मारने का भी काम करवाने में संकोच नहीं कर रही।
कहीं ‘ मैं ‘ की भावना ,इसको जन्म तो नहीं दे रही?
बहरहाल विचार कीजिए और अगर कुछ समझ में आए तो कमेंट में ज़रूर लिख भेजिए।

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धन्यवाद्

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